उड़ान – एक अद्‍भुत पहल

जिस देश में प्रौढ़ शिक्षा अभियान के नाम पर सरकार अरबों रूपये फूंक कर भी खाली हाथ खड़ी हैं, उसी देश में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जेब से पैसे खर्च करके, और धीरे – धीरे अपने मित्रों और परिचितों को साथ जोड़ कर ऐसे बच्चों को शिक्षा का वरदान देने के लिये आगे आ जाते हैं जिन्होंने कभी किसी स्कूल को यदि देखा होगा तो सिर्फ इसलिये कि वहां आस-पास से कुछ कूड़ा बीन सकें ।

पंचतत्व क्रेज़ीग्रीन की पहल पर आज “उड़ान” के नाम पर ऐसा ही एक प्रकल्प सहारनपुर में पिछले दो वर्ष से चल रहा है ।  वे बच्चे जिनके माता-पिता भी कभी स्कूल नहीं गये, आज सैंकड़ों की संख्या में उड़ान स्कूल में आते हैं, समाज की मुख्य धारा से जुड़ने लगे हैं।   जिन बच्चों के मुंह से गालियां बड़े स्वाभाविक अंदाज़ में निकला करती थीं, आज वही बच्चे मंच पर खड़े होकर कवितायें, कहानियां और संस्मरण सुनाने का हौंसला रखते हैं।  सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रस्तुतियां देते हैं।   कागज़ पर अपनी कल्पना से रेखायें खींचते हैं, रंग उकेरते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि उनमें और उच्च-शिक्षित परिवारों के बच्चों में प्रतिभा की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है।

“उड़ान प्रोजेक्ट को आरंभ करने का विचार आपके मन में कैसे आया?”  जब मैने ये प्रश्न अजय सिंहल से किया तो उन्होंने बताया कि अपने ब्लॉग पर २ अक्तूबर २०१० को  ’काली’ शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसमें ईंट ढोने वाली एक मज़दूरों  के जीवन की दिशा कैसे बदली जा सकती है,  इसे लेकर मन की अकुलाहट कागज़ पर उतर आई थी।   अतः तात्विक धरातल पर आप कह सकते हैं कि उस कविता ने अनजाने में ही उड़ान प्रोजेक्ट का बीजारोपण कर दिया था।  दिसंबर तक आते – आते मित्रों के साथ इस विषय पर चर्चा होती रही, प्रस्ताव आते रहे, जाते रहे।   फरवरी २०११ में इन्द्रा कैंप (राकेश सिनेमा के निकट) बस्ती के ३० बच्चों को लेकर शिक्षण कार्य आरंभ हो गया।

संपादक –  कविता की कुछ पंक्तियां सुना डालिये ।

अजय सिंहल –  मैं खुद को कवि नहीं मानता हूं ।  पर हां, मन में कभी कुछ भावनायें उमड़ती हैं तो उनको कागज़ पर नोट कर लेता हूं।  कविता कुछ यूं है…

सड़क से मकान की छत तक / ईंटे उठाती उठाती ‘काली’  /  खुद ईंट बन जाती है॓ / ईंट जो मकान बन के / सब सहता रहता है / धुप बारिश और सर्दी /  जीवन को बचाने को।

‘काली’ भी ईंट बन गयी है / जुल्म झेलने को खड़ी है / पति की गाली सुनती है / चुप खड़ी देखती रहती है / आगे जाकर काम करती है / आधा पेट भूखी रहती है / बच्चो के सपने बुनती है।

‘काली’ भी ईंट बन गयी है / ईंट जिसे किसी एक दिन / फिर मिटटी हो जाना है / काली जो फूल सी आई थी / माँ बाबा के आँगन में / अब ईंट बन गयी है / कुछ फूलो को बचाने को।

काली हम सब के घर में / रहती है हमेशा से चुपचाप / उसके मिटटी में जाने से पहले / आओ सब इंटो में रंग भर दे / काली कल फिर जहाज़ उड़ाएगी / काली रंगों के साथ भी हमेशा बस कमाल ही कमाल दिखाएगी ।

संपादक –  बहुत सुन्दर !

अजय सिंहल –  धन्यवाद !

संपादक –  तो आपने ३० बच्चों को स्कूल आने के लिये राजी कर लिया ?  कहां से मिले इतने बच्चे?

अजय सिंहल – यह कार्य आसान नहीं था पर बहुत मन था कि काश इन बच्चों को कुछ समय देकर पढ़ाया जा सके।   राकेश सिनेमा के आस-पास रह रहे इन बच्चों के माता-पिता से बात की कि हम उनके बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं तो उन्होंने सोचा कि शायद हमें सरकार से कुछ पैसे वगैरा मिले हैं, जिसे खर्च करने के लिये हम दो-चार दिन की नौटंकी करना चाहते हैं, बच्चों के साथ अपनी फोटो खिंचवा कर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हम इन बच्चों को पढ़ाते हैं।

संपादक – फिर?

अजय सिंहल – धीरे – धीरे मां-बाप को समझ में आने लगा कि  बच्चों का भविष्य बनने की यह राह खुल रही है तो क्यों न बच्चों को कुछ दिन भेज कर देखें।  पढ़ाने के लिये हमारे पास स्थान नहीं था अतः वहीं बस्ती में एक स्कूल की छत पर खुले में शाम को ४ से ६ बजे तक कक्षा आरंभ हुईं।  हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी – बच्चों के मन में शिक्षा के प्रति ललक जगाना, उनको ये एहसास कराना कि शिक्षित और सुसभ्य होने के कितने लाभ हैं!  बच्चे शुरु में २ घंटे एकाग्रता के साथ बैठने के अभ्यस्त नहीं थे।  “मैं तो मूतन जारा !”  “मुझे नहीं पढ़ना !”  जैसे वाक्य हमें अक्सर सुनने को मिलते रहे।  पर हमने भी ठान रखा था कि अपनी ओर से हार नहीं मानेंगे।   इतना अवश्य था कि पाठ्य-पुस्तकों में लिखी हुई बातें पढ़ाने पर जोर बहुत कम देते थे, खेल-कूद से शुरुआत करते थे, कहानियां सुनाते थे जिनसे जीवन के प्रति सन्देश मिले।   शुरु में तो प्रयास यही था कि किसी तरह से बच्चे उड़ान में आने के अभ्यस्त हो जायें, यहां आना उनको अच्छा लगने लगे ।

संपादक – सफलता मिली ?  उन्होंने कूड़ा बीनने का अपना काम छोड़ दिया?

अजय सिंहल – हमने अपने मुंह से कूड़ा बीनना छोड़ने के लिये उन बच्चों से या उनके माता-पिता से कुछ नहीं कहा ।   यदि कूड़ा बीन कर किसी का घर चलता है हमारे कहने भर से वह अपनी जीविका कैसे छोड़ सकता है?     पर हां, हमने शाम का ४ से ६ का समय शिक्षा के लिये रखा ।   सफलता का जहां तक प्रश्न है,  वह तो आपके सामने ही है।  बच्चे ३० से बढ़ कर १५० तक पहुंच गये।   उनकी सोच बदली,  भाषा बदली, व्यवहार बदला,  साफ-सुथरा रहने, नित्य नहाने – धोने की आदत बनी,  कला व पेंटिंग,  नृत्य – गायन,  नाटक, खेल-कूद के प्रति रुझान जागा।   पहले गालियां देने का स्वभाव था, उसमें बहुत कमी आई।   सार्वजनिक कार्यक्रमों में, मंच पर उन की प्रस्तुतियां कराई गईं इससे उनमें आत्म-विश्वास जागा।  समाज की मुख्य धारा में शामिल होने से जबरदस्त उत्साह का वातावरण बनने लगा।    अब तो  हमने ’उड़ान सीनियर’  के अन्तर्गत दो ग्रुप और शुरु कर दिये हैं – एक युवकों के लिये और दूसरा युवतियों के लिये।

संपादक – कमाल है !   समाज में कहीं से कुछ सहायता भी मिल पाई या नहीं ?

अजय सिंहल – अगर आप कुछ अच्छी सोच के साथ ईमानदारी से प्रयास करते हैं तो समाज में ऐसे बहुत लोग हैं जो आपका उत्साह वर्द्धन करने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं।   सच तो ये है कि लोगों को अगर ये विश्वास हो कि उनके द्वारा दी जा रही सहायता  वास्तविक पात्र तक पहुंच रही है तो सहायता करने वाले हाथ कभी पीछे नहीं हटेंगे।  यह सिर्फ विश्वास का संकट ही है कि लोग सहायता करने में संकोच करते हैं वरना हमारे समाज में सभी सेवा कार्य जनता के सहयोग से ही संचालित होते रहे हैं।  सरकारी मशीनरी में १०० रुपये की सहायता चलती है तो पात्र को सिर्फ ५ पैसे ही पहुंच पाती है।  अब तो एन.जी.ओ. के बारे में भी ऐसी ही बातें सुनने में आने लगी हैं।   पर हमने सरकार से न तो कुछ मांगा है और न ही इसकी जरूरत अनुभव होती है।  अब किसी से भी नकद सहायता मांगते ही नहीं।   कोई ब्लैकबोर्ड देता है तो कोई बच्चों के बैठने के लिये बैंच और मेज की व्यवस्था कर देता है।  कोई दानी आता है तो हमारे छात्र-छात्राओं के लिये नये कपड़े सिलवा देता है।   यह भवन भी बच्चों के उपयोग के लिये ही मिला है।

कौन कहता है आसमां में सुराख़ नहीं हो सकता !

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों !!

  ’उड़ान’ निश्चय ही आसमान में सुराख़ करने का ऐसा ही सफल प्रयास है जिसके लिये पंचतत्व क्रेज़ी ग्रीन की जितनी भी सराहना की जाये, कम ही है।

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