कैफी आज़मी पर गोष्ठी व ग़ज़ल कार्यक्रम

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पद्मश्री कैफी आज़मी ( 1919 – 10 मई 2002)

सहारनपुर : 10 मई ।   जागरुक महिला संस्था परचम ने आज प्रसिद्ध फिल्म गीतकार पद्मश्री  कैफी आज़मी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से युवा पीढ़ी को परिचित कराने के लिये हिन्दू कन्या इंटर कालेज,  बाबा लालदास रोड परिसर में गोष्ठी व ग़ज़ल कार्यक्रम का सफल आयोजन किया।   नौजवान भारत सभा के रवीन्द्र कुमार ने कहा कि उर्दू के अहम इंकलाबी शायर कैफी़ आज़मी का जन्म 1919 में आज़मगढ़ जनपद के मज़वां ग्राम में एक जमींदार परिवार में हुआ था। कैफी आज़मी नाम से विख्यात इस प्रसिद्ध गीतकार का वास्तविक नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था।   उनकी पत्नी शौकत आज़मी रंगकर्मी व लेखिका हैं तथा पुत्री और दामाद शबाना आज़मी व जावेद अख्तर हैं – जो राज्यसभा से सांसद हैं।    सरदार अनवर ने कहा कि उनका पहला कलाम 1943 में “झंकार” के नाम से और 1947 में “आखिरी शब”, तीसरा “आवारा सज़दे” 1973 और “मेरी आवाज़ सुनो” 1974 में शाया हुआ।   वह ऐसे इंकलाब के पैरोकार थे जिसमें कोई गरीबी और मुफलिसी का शिकार न रहे, समाज में सबको बराबर का हक़ और दर्ज़ा मिले।

जु़बैर खान ने कहा कि कैफी आज़मी साहब अक्सर कहा करते थे कि वह गुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुए और आज़ाद हिन्दुस्तान में जी रहे हैं और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में मरना चाहेंगे।   मौ. तारिक ने उनकी ग़ज़ल ’कोई तो सूद चुकाये, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का जो आज तक अधूरा है।”  को याद किया।

कैफी आज़मी द्वारा सैंकड़ों फिल्मों के लिये यादगार और मशहूर गीत लिखे गये जिनमें हीर रांझा, आखरी ख़त, कागज़ के फूल, शोला और शबनम, शमा, हिन्दुस्तान की कसम, तमन्ना, पाकीज़ा (यूं ही कोई मिल गया था, सरे राह चलते चलते)  आदि संगीत प्रेमियों की ज़ुबां पर आज तक मचलते हैं।   वह सिर्फ गीतकार ही नहीं थे, हिन्दुस्तान के बंटवारे को लेकर बनी फिल्म ’गर्म हवा’ के लेखक होने के नाते उनको राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।   झनकार की नज़्म “औरत”  शायला ने अपनी खूबसूरत आवाज़ में पेश की।   सुषमा रानी ने “तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रही हो”  सुना कर वाहवाही बटोरी।  राहिला ने “वक्त न किया, क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम”  गाकर इस अमर गीतकार को श्रद्धा सुमन अर्पित किये।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए काज़ी नदीम ने कहा कि कौमी एकता, आपसी भाईचारा, औरतों की इज़्ज़त और मर्यादा कैफी आज़मी ने सबसे अधिक प्रिय विषय रहे जिन पर उनकी कलम निरंतर चलती थी।   कैफी आज़मी की योग्य सुपुत्री शबाना आज़मी आज भी कैफी साहब द्वारा आज़मगढ़ के मिज़वां में  स्थापित किये गये लड़कियों के स्कूल को उत्तरोत्तर प्रगति की ओर ले जा रही हैं।    गोष्ठी का कुशल संचालन करते हुए हिन्दू कन्या इंटर कालिज की प्रधानाचार्य डा. कुदसिया अंजुम ने कैफी आज़मी की एक इंकलाबी नज़्म सुनाई “आज की रात बहुत तेज़ हवा चलती है, आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी।  सब उठें, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।”   मौ. फैसल ने “मेरी आवाज़ सुनो, प्यार का राग सुनो”  गाकर तालियां बटोरीं।

कार्यक्रम में १० मई १८५७ के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

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