भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहां है?

जब से भ्रष्टाचार को लेकर देश में व्यापक बहस छिड़ी है, एक बात बार-बार कही जा रही है कि देश में भ्रष्टाचार बहुत गहराई तक जड़ें जमा चुका है, इसे मिटा पाना संभव नहीं है। कुछ लोगों का तो स्पष्ट मत है कि भ्रष्टाचार हमारे खून में शामिल है और हम भारतीय ऐसे ही हैं ।  भ्रष्टाचार की समस्या का विश्लेषण करना है तो पहले कुछ मूलभूत प्रश्नों के जवाब तलाशने चाहियें !  उस जवाब में से ही समस्या का समाधान निकल कर सामने आ सकता है।

पहला प्रश्न,  कोई भी व्यक्ति किसी को रिश्वत देने का प्रस्ताव कैसे कर पाता है? दूसरा प्रश्न,  किसी की इतनी हिम्मत कैसे हो पाती है कि वह किसी से रिश्वत मांग सके?  तीसरा प्रश्न,  रिश्वत का प्रस्ताव आखिर क्यों किया जाता है?

पहले प्रश्न का उत्तर है – संभावना का नियम! चूंकि, समाज में रिश्वत लेना-देना आम हो चुका है इसलिये इस संभावना के आधार पर कि ये व्यक्ति भी रिश्वत लेता होगा, उसे रिश्वत का प्रस्ताव किया जाता है।  किसी ईमानदार व्यक्ति के लिये किसी को भी रिश्वत देने का प्रस्ताव करना बहुत कठिन होता है।  उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती कि किसी को रिश्वत ऑफर करे।  हां, जो लोग दिन-रात विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को रिश्वत देकर अपना या दूसरों का काम कराने के आदी हैं, उनकी हिम्मत खुल जाती है और वह बड़े आत्मविश्वास के साथ किसी को भी रिश्वत का प्रस्ताव दे देते हैं।  यदि आप एक साल या छः महीने किसी वकील के सहायक के रूप में कार्य कर लें तो आप रिश्वत देने में महारत हासिल कर लेंगे। बेखटके किसी की भी शर्ट की पाकिट में नोट सरका देना और उसका कंधा थपथपा कर कहना, “चल, अब फटाफट साइन कर !“ कुछ लोगों के लिये बहुत सरल हो जाता है। कचहरी के बाबुओं से लेकर न्यायाधीश तक को रिश्वत देते-देते वकील इस मामले में एक्सपर्ट हो जाते हैं और दलाल की भूमिका के लिये आदर्श उम्मीदवार माने जा सकते हैं।  जो लोग पांच – सात साल वकील के रूप में कार्य कर चुके हैं वह ये मानने के लिये तैयार ही नहीं होंगे कि बिना रिश्वत के यह दुनिया चल भी सकती है।

अब आया दूसरा प्रश्न कि कोई व्यक्ति रिश्वत कैसे मांग पाता है?  अक्सर रिश्वत मुंह खोल कर मांगनी नहीं पड़ती है।  बस, परेशान करते रहो, किसी का जायज़ काम भी मत करो, बीसियों कानूनी नुक्ते दिखाते रहो, देर करते रहो, मामूली-मामूली गलतियों को भी तिल का ताड़ बना कर दिखाओ, कानूनी कार्यवाही का भय दिखाओ।  जो समझदार होंगे, जल्दी समझ जायेंगे कि इस समस्या का समाधान क्या है, बाकी लोग भी चप्पल घिस – घिस कर देर-सबेर समझ ही जायेंगे।  यह कुछ ऐसा ही है जैसे कुछ पाखंडी पंडित और ज्योतिषी लोग अपनी असामियों को ग्रह-नक्षत्रों के जाल में उलझाते हैं और ’बुरा वक्त आ रहा है’ ’प्राणों पर संकट आ सकता है’, उपाय करना आवश्यक है, इस प्रकार की बातों से उनको आतंकित करते हैं और फिर उपाय के रूप में दान-पुण्य करने के लिये कहते हैं। अपने यजमान की आर्थिक स्थिति के अनुरूप ही ’उपाय’ बताया जाता है ताकि कहीं भाग ना जाये या वहीं बेहोश होकर ना गिर पड़े!  बेचारा यजमान चूंकि पोथी-पत्रों की भाषा नहीं जानता, इन पाखंडियों के चक्कर में उलझता है और अपने ’महादशा को संवारने के लिये, बुरे वक्त को ठीक कराने के लिये’ पंडित जी को दान-पुण्य करता रहता है।   सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी और अधिकारी भी ऐसे ही कानूनी धाराओं के जाल में फंसा कर अपने आसामी को लूटते हैं।  रिश्वत लेना चूंकि कानूनी अपराध है इसलिये इसे इस नाम से न लेकर अन्य नामों से प्राप्त किया जाता है।

जो लोग अपना अनुचित काम कराना चाहते हैं वह तो नोटों का बैग लेकर घूमते फिरते हैं और पता लगाते हैं कि किस अफसर का क्या रेट है!  अलग अलग काम के हिसाब से रेट भी अलग अलग ही होते हैं।  जितनी जल्दी मची हो, उतना ही रेट भी ऊंचा होता जाता है।  मोल-भाव करने के लिये किसी दल्ले की भी अक्सर जरूरत पड़ती है क्योंकि कितना भी भ्रष्ट इंसान हो, वह अपने मुंह से कुछ नहीं मांगना चाहता, दूसरे यह भी देखना पड़ता है कि आसामी विश्वसनीय भी है या नहीं। कहीं स्टिंग आपरेशन तो नहीं होने वाला है!  ऐसे लोग कहते हैं, ’अजी, जमाना बहुत खराब है, कौन जाने कब सी.बी.आई. वाले आकर रंगे हाथ गिरफ्तार कर लें!’

ऐसा क्यों है कि जिस समाज में लाखों व्यक्तियों के बीच में केवल एक-दो व्यक्ति ऐसे भ्रष्ट हुआ करते थे, जो रिश्वत के बिना काम करने को राजी नहीं थे, अब अधिकांश व्यक्ति भ्रष्ट ही दिखाई देते हैं?  सच कितना भी कड़वा हो, यह तो मानना ही होगा कि आजकल समाज में केवल अपवाद के रूप में कुछ व्यक्ति ऐसे बच रहे हैं जो रिश्वत वाली सीट पर बैठने के बावजूद भी रिश्वत नहीं लेते।  ऐसे ईमानदार व्यक्ति अक्सर बाकी साथियों के लिये खतरा या अवरोध माने जाते हैं।  लोग उनका उपहास भी करते हैं और उनसे भयभीत भी रहते हैं।  उपहास इसलिये कि वह एक ऐसे सिस्टम के विरुद्ध जाने का प्रयास कर रहे हैं जो अब बहुत मजबूती ग्रहण कर चुका है और ऐसे व्यक्ति सिस्टम से टकरा कर अपना सिर तो फुड़वा सकते हैं पर सिस्टम को बदल नहीं सकते !  ऐसे व्यक्तियों को उनके अपने घर के सदस्य भी अव्यावहारिक आदर्शवादी के रूप में देखते हैं क्योंकि उनकी ईमानदारी परिवार के सदस्यों के लिये भी कष्टकर हो जाती है।  यदि ईमानदार अधिकारी की पत्नी को हर दूसरे तीसरे महीने बोरिया बिस्तर समेट कर नये अनजान शहर में जाना पड़े, बच्चों का नये स्कूलों में एडमिशन कराना पड़े तो वह समझ नहीं पायेगी कि अपने पति की ईमानदारी के लिये उसके चरण स्पर्श करे या उस ईमानदारी के कारण मिल रहे कष्टों के लिये उस पति को दोषी ठहराये!  ऐसे ईमानदार अधिकारियों की पत्नियां अपनी आर्थिक स्थिति की तुलना हमेशा अपने पति के सहयोगियों की पत्नियों से करती रहेंगी और अपने पति की ईमानदारी के लिये मन ही मन कुढ़ती रहेंगी।  यही नहीं,  ऐसे ईमानदार लोग चूंकि गलत काम के लिये हामी नहीं भरते,  गलत काम होता देख कर विरोध करते हैं,  जहां कहा जाये, वहां हस्ताक्षर नहीं करते – ऐसे में आसामी और सहकर्मी भी उनसे नाराज़ ही रहते हैं और उनसे जल्द से जल्द पीछा छुड़ाने के लिये उनका स्थानांतरण करा देना चाहते हैं।

इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है? कभी भ्रष्ट अफसर अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे, अब ईमानदार अफसर अपवाद हो गये हैं।  यह कहने के लिये विवश होना पड़ता है कि इस स्थिति की पूरी की पूरी जिम्मेदारी शासन के शीर्ष पर बैठे लोगों की है।  निजी क्षेत्र में किसी भी कंपनी का मालिक अपने कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को सहन नहीं करता, तुरन्त निकाल बाहर करता है। परन्तु सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार को ऊपर से संरक्षण मिलता है।  जब मालिक ही करोड़ों – अरबों का गोलमाल करने में जुटा है तो कर्मचारी और अधिकारी भी पीछे क्यों रहें?  शायद यही वज़ह है कि किसी भी भ्रष्ट व्यक्ति को कभी सजा मिली हो, ऐसा सुनाई नहीं देता।  यदि ’दुर्भाग्य से’ कोई भ्रष्ट व्यक्ति रंगे हाथ पकड़ा जाता है तो पूरा भ्रष्ट तंत्र मिल कर उसकी रक्षा करता है, न कर पाये तो उसका भाग्य!  इतना ही नहीं, किसी ईमानदार अफसर को रास्ते से हटाने के लिये भी जाल बिछाया जाता है और झूठे आरोप लगा कर, झूठे साक्ष्य तैयार करके उसे फंसाने की कोशिश की जाती है।

यदि देश से भ्रष्टाचार का खात्मा करना है तो हमें शीर्ष पर बैठे हुए लोगों से आरंभ करना होगा।  शीर्ष पर बैठे लोगों को कठोरतम दंड तुरन्त दिये जायेंगे तो उसका प्रभाव अगले ही दिन से नीचे तक दिखाई देने लगेगा।  यह कहना कि जन-लोकपाल से क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा जब पूरा का पूरा तंत्र ही भ्रष्ट है, भ्रष्टाचार के संरक्षकों द्वारा प्रायोजित वितंडावाद है, और इससे अधिक कुछ भी नहीं !

यदि कोई सड़क बनाये जाने के दो-तीन महीने के भीतर टूट जाती है तो इसकी सजा परिवहन मंत्री और चीफ इंजीनियर को सलाखों के पीछे जाने के रूप में मिले, ठेकेदार को भी दस-बीस वर्ष के लिये ब्लैकलिस्ट कर दिया जाये तो अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता और जूनियर इंजीनियर की क्या मजाल है कि ठेकेदार से कमीशन मांग सकें ?  यदि ठेकेदार को रिश्वत देने के बाद में ही पेमेंट मिलना है तो वह भी कोलतार की जगह थूक से ही काम चला लेता है, सीमेंट के स्थान पर रेत से ही भवन खड़े कर देता है।  असली दोषी ठेकेदार नहीं, पी.ड्ब्लू डी विभाग के कर्ता धर्ता हैं जिनको यदि फांसी पर नहीं लटकाना है तो कम से कम पच्चीस वर्ष के लिये जेल में तो भेजा ही जाना चाहिये।  यही फार्मूला हर विभाग के लिये लागू होना चाहिये !

जनता अपने प्रतिनिधि चुन कर विधान सभाओं में और संसद में भेजती है ताकि वे लोग वहां जाकर जनता के हित की चिन्ता कर सकें, इन सरकारी बाबुओं के ऊपर नियंत्रण रख सकें ।  परन्तु अफसर, नेता और अपराधियों का गठजोड़ मिल कर जनता का ही सत्यानाश करने में लग जाये तो क्रांति की जरूरत पड़ जाती है। भारत में हो तो यह क्रांति अन्ना जैसे लोग अहिंसक उपायों से भी ले आते हैं।  जो लोग संसद की सर्वोच्चता की रट लगाये चले जा रहे हैं, वे या तो भोले भंडारी हैं और या फिर उनके हित इन भ्रष्टाचारियों के हितों के साथ स्थाई रूप से जुड़े हुए हैं।  चूंकि मामला करोड़ों करोड़ रुपये का है, इसलिये सरकार साम – दाम, दंड – भेद हर उपाय अपना कर इस आंदोलन का तिया-पांचा करने को उद्धत है!  यदि अन्ना के पीछे मौजूद जनता के तेवर सख्त होते चले जायें तो सरकार अपना आपरेशन खुद करने के लिये विवश हो सकती है वरना संसद में बैठे सारे भ्रष्ट मिल कर अन्ना के आंदोलन को येन-केन-प्रकारेण खत्म कराना चाहेंगे, अन्ना को बदनाम करना, शारीरिक रूप से अक्षम कर देना – सब कुछ उनके लिये संभव है।  जनता जागेगी, तभी कुछ बात बनेगी !

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